Friday, 21 October 2016

तन्हाई के घनेरे से अंधेरे में एक अनदेखा बादल था,
ना जाने कैसे तूने ठेहराके रोशनी की झलक दिखाई,
कितने हसीन थे वो पल के दिल में एक उमीद सी झीलमिलायी,
ऐसी लत लगी रोशनी की के अंधेरे ने बेगाना कर्दिया,
तेरे जाने के बाद जब लौटने की कोशिश की तो अंधेरे ने मुझे ठुकराने की साजिस की,
अभी ना उसपार रहा नहीं इस पार, 
किस फ़ुर्सत से खुदाने तुम्हें बनाया,
के तुम्हारे रोशनी की झलक तराशता रहता हूँ अख़्सर,
मगर अफ़सोस है कि तुम तुम हो और कोई और उस क़ाबिल नहीं,
तेरे दिल की धड़कन और आँखो का नूर, और बाँतो की मीठस किसी और में शामिल नहीं,
ज़िद नहीं मोहोब्बत है, इसीलिए तो दूर रह कर भी महसूस होती तेरी ज़रूरत है,
कभी भी कहानी पूरी ना होने की तो मेरे नसीब की अकस्सर ही आदत है। 
- Hrishikesh J C

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